मैं सविता शुक्ला, एक घरेलु स्त्री हूँ। मुझे मनोभावनाओं को लिखकर व्यक्त करना पसंद हैं।
मैं पढ़ाई में अव्वल थी। बचपन से ही तुकबंदी करती थी और लिखने का भी शौक था। साहित्य में विशेष रुचि के कारण बी. ए. अंग्रेजी औनर्स) की।
शादी के बाद बढ़ी जिम्मेदारियों के कारण लिखना छूट गया। पर समय निकाल कर कुछ न कुछ पढ़ती रहती थी। पति के सहयोग से लिखना शुरू की और लेखनी ने रफ्तार पकड़ ली। पर एक कठिन दौर भी आया, जब बीमारियों ने मेरे तन और मन को जीर्णशीर्ण कर दिया। फिर ब्लॉग पढ़ते पढ़ते लिखने की इच्छा जागी। धीरे धीरे पुनः लिखना शुरू किया और कहानियों के रुप में मेरे अंदर जमी भावनाएं खुल कर सामने आने लगी। अब ब्लॉगर बन कर वापस लिखना प्रारंभ किआ है। पाठकों की मनोबल बढ़ाने वाली प्रतिक्रियाएं मेरी लेखनी को सबल बनाती हैं।
"धर्मयुग" में पहली बार मेरी रचना सत्रह वर्ष की आयु में छपी थी। उसके बाद कॉलेज की पत्रिका में भी मेरी रचना को स्थान मिला। आकाशवाणी के भी कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थी। "वनिता", "गृहशोभा", "सरिता" और "सखी" जैसी पत्रिकाओं में भी विचार छपे। कविता पाठ करने में भी आनंद आता है। आज भी सोसायटी के कार्यक्रमों में कविता पाठ करती हूँ और लोगों का प्यार पाती हूँ।
मैं परिवार की जान हूँ और परिवार मेरी जान हैं।
मैं सविता हूँ, लेखनी के सहारे ज्योतिपुंज बनकर लोगों को राह दिखाना चाहती हूँ।