मन में उठती विचारों की लहरों को शब्दों में ढालने की कोशिश है ये, हमारी आपकी बातें हैं और पाठकों के दिलों को छू लेने का प्रयास भी है।

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धारा की तरह ....

धारा की तरह ....


मैं चली जाती हूँ नदियां किनारे
ढूंढने सुकून के पल
कल कल करती
बहती धारा की गति को देख
सीखती हूँ 
जिंदगी की बहती धारा में
बहते जाना निरंतर,
रास्ते के छोटे बड़े पत्थर भी
नहीं रोक सकते
धारा के अनवरत प्रवाह को,
तब मैं कैसे रुक सकती हूँ
रुकावटों के आने से,
मैं भी नदियों के धारा की तरह
बह जाना चाहती हूँ
परेशानियों से जूझते हुए,
धारा की गति से घिसते घिसते
कठोर पत्थर भी 
चिकने हो जाते हैं
नदियों की राहों में,
परेशानियों से जूझते हुए  
छोटी छोटी खुशियाँ
मिलने लगती हैं
जिंदगी की धारा में बहते हुए.
-सविता शुक्ला