मधुरा और श्रुति दोनों बचपन की सहेलियाँ थीं। दोनों मध्यम वर्गीय परिवारों से थीं। आर्थिक स्थिति समान होते हुए भी दोनों सहेलियों के विचारों में भिन्नता थी। श्रुति हमेशा संतुष्ट और खुश रहने वाली लड़की थी और मधुरा दिखावा पसंद महत्वाकांक्षी लड़की थी।
दोनों ने साथ में पढ़ाई की और दोनों की शादी एक ही शहर में हो गयी। श्रुति के पति का एक छोटा सा मेडिकल स्टोर था। वह भी पति के कामों में हाथ बँटाती थी। इसलिए उसको भी पति के व्यापार की अच्छी जानकारी हो गई थी।
दो बच्चे और पति के साथ वह गृहस्थी में संतुष्ट व खुश रहती और बच्चों की परवरिश पर बहुत ध्यान देती।
मधुरा का पति भी उसी की तरह अति महत्वाकांक्षी था। जॉब छोड़कर उसने व्यापार शुरू किया और संयोग से वह चल निकला। मधुरा भी दो बच्चों की माँ बनी। घर में पैसे की कमी तो थी नहीं। मधुरा बच्चों की हर फरमाइश बिना सोचे समझे पूरी कर देती और दूसरे के सामने अपने बच्चों की उटपटांग फरमाइशों का इस तरह बखान करती मानो बच्चों ने महान काम कर दिया हो।
मधुरा जब भी श्रुति के घर आती, उसे नीचा दिखाने में एक भी कसर नहीं छोड़ती। कभी कहती, "श्रुति, तुम्हारे घर में फैन की हवा से मैं परेशान हो जाती हूँ। मुझे तो एसी की आदत हो गई है। तुम भी एसी क्यों नहीं लगवा लेती ?" कभी कहती, "मेरे बच्चे दाल-चावल, पराठा वगैरह नहीं खाते। उन्हें तो पीज्जा, बर्गर, पास्ता वगैरह ही चाहिए। बहुत मुश्किल से मैं उन्हें फ्रूट्स खिलाती हूँ।"
श्रुति चुपचाप सहेली की बेतुकी बातें सुनती रहती तो वह श्रुति को और सुनाती। वह कहती, "श्रुति, तुम्हारे घर में अमरूद के पेड़ लगे हैं। तुम्हें पता है कि अमरूद गरीबों का सेव है। तुम्हें फल खरीदने के पैसे नहीं लगते। घर में ही फल मिल जाते हैं। आजकल मार्केट में फलों के दाम भी आसमान छूते हैं। सबके वश की बात नहीं है फल खरीदना।"
श्रुति की आँखों में आँसू भर आते। पर मधुरा को इससे कोई लेना-देना नहीं रहता। वह आती तो सहेली से मिलने। पर सहेली को नीचा दिखाकर दुखी कर जाती।
इसी कारण श्रुति के पति और बच्चे मधुरा से बहुत चिढ़ते थे। वे कहते भी थे कि चाहे मधुरा को दो टूक जवाब दो चाहे उससे दूर हो जाओ। पर श्रुति कहती, "मैं उसे बचपन से जानती हूँ। वह ऐसी ही है। दूसरे की भावनाओं की उसे कद्र नहीं और दिखावे का भूत हमेशा उसके सिर पर सवार होता है। इस कारण उसकी किसी से दोस्ती टिकती नहीं थी। एक मैं ही थी, जिस पर वह धौंस जमाती। आज भी वही हो रहा है।"
उसके पति ने कहा, "लेकिन जब उसकी ओछी बातों से तुम्हारा दिल दुखता है और तुम्हारे आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसे देख मुझे बहुत बुरा लगता है। इसलिए अब मैं ही एकदिन उसे सटीक जवाब दूँगा।"
पति की बात उसे भी सही लग रही थी। अब पानी सर के उपर से निकल रहा था। मधुरा को जवाब देने का समय आ गया।
श्रुति उसे जवाब देती उससे पहले समय ने उसे जवाब दे दिया। लॉकडाउन की वजह से मधुरा के पति का व्यापार ठप्प हो गया। दिखावे की प्रवृत्ति के कारण उन्होंने आय से अधिक कर्ज ले रखा था। लापरवाह स्वभाव के कारण बचत बिलकुल नहीं था। वे लोग अर्श से फर्श पर आ गये।सब कुछ छिन जाने के कारण वे लोग गाँव के छोटे से घर में रहने चले गये। दोनों शाम का खाना भी बहुत मुश्किल से मिलता था।
श्रुति के पति का मेडिकल स्टोर लॉकडाउन में भी खुला रहा। उसके पति और बेटे ने सावधानी पूर्वक कठिन समय में भी स्टोर को संभाला। उनकी आर्थिक स्थिति पूर्ववत ही रही और वे लोग लॉकडाउन के सारे नियमों का पालन करते हुए अपने घर और शहर में ही रहे। श्रुति ने कुछ सब्जियाँ भी किचन के पीछे लगा रखी थीं। जब घर से निकलने की मनाही थी तब भी वे लोग घर की उपजाई ताजी सब्जी खा रहे थे। इस तरह श्रुति की सूझबूझ और संतुष्ट स्वभाव के कारण उसका परिवार सीमित साधनों में भी खुश रहा। समय की मार का प्रभाव उन पर नहीं पड़ा।
एकदिन मधुरा का फोन श्रुति के पास आया। वह रो रोकर अपनी दुर्दशा की कहानी सहेली को सुना रही थी। श्रुति का भी दिल पसीज गया। वह मधुरा को सान्त्वना देते हुए बोली, "समय एक सा नहीं रहता। दुख के बाद सुख फिर से आएगा। पर दुख सिर्फ रूलाने नहीं, सबक सिखाने आता है। आय से अधिक खर्च और फालतू का दिखावा हानिकारक होता है। ये तो तुम्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा। अब भी वक्त है। तुम ये अच्छी तरह समझ जाओ और बच्चों की सही परवरिश करो। ताकि तुम्हारी तरह उन्हें भविष्य में सबकुछ गँवा कर रोना न पड़े।" वह जोर देकर बोली, "एक और बात कहना चाहूंगी। तुम जब मुझे नीचा दिखाती थी न, उस समय मेरे आँखों में आँसू आ जाते थे। क्योंकि तुम्हारी कड़वी बातों से मेरा दिल दुखता था। अपनी खुशियों के लिए किसी का दिल मत दुखाना।"
श्रुति ने सही समय पर मधुरा को जवाब देकर आईना दिखा दिया। जो दिल के करीब होते हैं उन्हें सही रास्ता दिखाना पड़ता है।
सविता शुक्ला
बहुत सुंदर रचना.
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