पंखुड़ी अपने पापा की लाडली थी। बचपन से ही पापा उसकी बातें बहुत धैर्य से सुनते थे और इतने सरल शब्दों में समझाते थे कि वह पापा की हर बात मान लेती थी। उसके भैया उसे चिढ़ाते हुए कहते थे, "तू पापा की चमची है।" उसे ये सुनना भी अच्छा लगता था। क्योंकि पापा की बातें वह आँख मूंद कर भी मान लेती थी। जब बाहर से पापा घर आते, वह दौड़कर जाती और दरवाजा खोलती। फिर उनके बोलने से पहले ही वह उनके लिए पानी लेकर खड़ी रहती।
जब उसकी शादी की उम्र हुई, साहिल उन्हें पंखुड़ी के लिए बहुत पसंद आया। पर समस्या ये थी कि बिटिया की पढ़ाई पूरी नहीं हुई थी। वह इतना अच्छा रिश्ता हाथ से जाने भी नहीं देना चाहते थे। पापा ने उससे कहा, "बेटा मैं असमंजस में हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी पढ़ाई पूरी करो और साहिल से ही तुम्हारी शादी हो। क्योंकि वह मुझे तुम्हारे योग्य वर लग रहा है। इसलिए ये रिश्ता भी पक्का करना चाहता हूँ। अगर तुम शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखोगी तो मैं ये रिश्ता पक्का कर दूँ।"
पंखुड़ी के आँखों में भी साहिल के सपने तैरने लगे थे। उसके चुम्बकीय व्यक्तित्व के आकर्षण में वह फँस चुकी थी। इसलिए उसने शादी के लिए हाँ कर दी। माँ ने उसे समझाया था कि शादी के बाद पढ़ाई करने में मुश्किलें आएंगी। पर तुम अगर पढ़ना चाहोगी तो सब मुश्किल पार कर लोगी।
शादी के बाद पंखुड़ी की दुनिया साहिल और ससुराल के इर्दगिर्द ही सिमट गई। शुरू में वह पढ़ाई करने की कोशिश की। पर जिम्मेदारियों तले वह दबती चली गई और अपनी पढ़ाई और अपने सपने सब भूल गई।
वह मायके भी बहुत कम जाती। फोन पर सबसे बात करती रहती थी और अपनी गृहस्थी की सारी जिम्मेदारियाँ निभा रही थी। पापा उससे मिलने उसके ससुराल आए। वह खुशियों से चहक रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि वह बारह साल पुरानी वही पंखुड़ी है, अपने पापा की लाडली। वह पापा के लिए मनपसंद नाश्ता और खाना बनायी। सबको समय पर ऑफिस और स्कूल भेजकर वह बचे काम निपटाने लगी। पापा बहुत बारीकी से उसके कामों का निरीक्षण कर रहे थे। वह भी बिटिया के सुखी संपन्न गृहस्थी को देखकर बहुत खुश थे।
जाते समय पापा ने उससे कहा, "पंखुड़ी बेटा, तुम्हारी खुशियाँ देख मैं भी बहुत खुश हूँ। तुमने बहुत अच्छी तरह से सब संभाला है और अपनी माँ की तरह ही एक सफल गृहिणी बन गई हो। पर एक बात तुम बिलकुल भूल गई।"
वह आश्चर्य से बोली, "क्या पापा ? "
पापा ने गंभीर होकर कहा, "तुम पढ़ाई पूरी नहीं की। पढ़लिखकर कुछ बनने का सपना देखना तो तुम भूल ही गई। गृहस्थी के कामों को निपटाने के बाद भी तुम्हारे पास बहुत समय बचता है। उसका सदुपयोग करो।खाली समय में कुछ पढ़ो। हो सके तो अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर लो।"
पापा की बातें उसके दिल को छू गई। वह मन की बात पति को बताई, "साहिल मैं फिर से पढ़ना चाहती हूँ।"
साहिल ने उसे गौर से देखा और कहा, "क्या तुम फिर से पढ़ाई करोगी ? इतनी सारी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए तुम्हारी पढ़ाई हो पाएगी।"
वह पति की आँखों में देखते हुए बोली, "आप मेरा साथ दोगे न।"
पत्नी के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए वह बोला,"ऑफ्कोर्स मेरी जान। लेकिन ये नयी डगर बहुत मुश्किल भरी होगी।"
पंखुड़ी बोली, "आप मुझे डरा क्यों रहे हो ? पापा ने मुझे फिर से पढ़ाई करने के लिए कहा है तो उन्हें मुझ पर विश्वास होगा तभी कहा है न।"
साहिल बोला," विश्वास तो मुझे भी तुम पर है। तुम एक बार जो ठान लेती हो वो करके ही रहती हो।"
पंखुड़ी के आँखों में पुराने सपने नये कलेवर में चमकने लगे।
वह पढ़ाई शुरू की और समय समय पर पापा से परामर्श भी लेती। बहुत सी बाधाएं भी आयीं। कभी घर मेहमानों से भर जाता। दिनभर की थकान के बाद सोने का मन करता। पर उसे रोज की तरह थोड़ी देर पढ़ना भी था। साहिल चाय बनाकर दे देते। कभी स्वयं चाय बनाकर पीती और पढ़ाई करती। कभी बच्चे बीमार पड़ जाते और कई दिनों तक पढ़ाई छूट जाती। उनके स्वस्थ होते ही वह दोगुने उत्साह से पढ़ाई में जुट जाती। बच्चों के होमवर्क कराते हुए अपनी किताबों पर भी सरसरी निगाह डाल देती।
इस तरह उसने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। उसकी इस उपलब्धि से सबसे ज्यादा खुश उसके पापा थे। उसके बाद उसने जॉब के लिए एप्लीकेशन देना शुरू किया। बार बार उसे निराशा ही हाथ लग रही थी। वह उदास हो जाती थी। पर अपने लक्ष्य को पाने के लिए दृढ़तापूर्वक लगी रही।
एक स्कूल में उसे टीचर की जॉब मिली। उसका पूरा परिवार उस पर गर्व कर रहा था। ये देख वह मन ही मन पापा को धन्यवाद कर रही थी। पापा ने ही उसे उसके सपनों से मिलवाया था।
सास ससुर रिश्तेदारों से फोन पर कह रहे थे, "मेरी बहू टीचर बन गई।"
उनके चेहरे पर गर्व के भाव वह साफ देख रही थी। पति और बच्चे तो खुश थे ही। मायके में भी सब लोग बहुत खुश थे।
वह पापा को फोन कर बोली, "पापा आपने शादी के बाद भी मेरा सही मार्गदर्शन किया। जिसके कारण मैं ने अपना सपना पूरा किया।"
पापा ने बिटिया का हौसला बढ़ाते हुए कहा," बेटा, मैं ने तो तुम्हें सिर्फ रास्ता बताया। तुमने उन रास्तों पर चलना स्वीकार्य किया और बिघ्न बाधाओं को धैर्य से पार करते हुए लक्ष्य को प्राप्त किया। ये सब तुम्हारी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम है। जो पूरी लगन और निष्ठा से काम करते हुए आगे बढ़ते हैं उन्हें सफलता अवश्य मिलती है। अब तुम्हारी जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं। पर मुझे आशा है तुम उन्हें भी अच्छी तरह निभाओगी।"
पंखुड़ी की आँखों में खुशियों के आँसू भर आए। माँ भी उसे सफलता की बधाईयाँ दे रही थी। भाई भाभी उससे पार्टी करने की बोल रहे थे। पर उसके दिमाग में पापा की बातें गूंज रही थी। वह सोचने लगी, अगर पापा ने उसके खोए हुए सपनों से नहीं मिलवाया होता तो आज वह इतनी सारी खुशियों की हकदार नहीं होती। पापा बच्चों की जिंदगी में रौशनी भर देते हैं।
वह सबसे ढ़ेर सारा प्यार और आशीर्वाद पाकर चल पड़ी मंजिल की नयी पगडंडियों पर।
सविता शुक्ला
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