ऐसे समय में मेरी एक जेठानी मेरी बहुत मदद करती। मैं उनसे नये ट्रेनी की तरह रसोई के ट्रिक्स सीख रही थी। सबकुछ उनसे ही पूछकर बनाती और वो भी बहुत प्यार से मुझे सिखाती थी। जब घर में सिर्फ सासूमां होतीं तो हम दोनों जेठानी देवरानी साथ में गाना गुनगुनाते हुए भी खाना बनाते रहते। सासूमां भी हम दोनों का सामंजस्य देखकर खुश होतीं।
इस तरह मैं रसोई में भी खाना बनाते हुए खुश रहती। क्योंकि पहले मुझे रसोई सबसे उबाऊ जगह लगती थी। मैं ऐसा सोचती थी कि रसोई ही वो जगह है जहाँ बहुत सी औरतें के सपने दम तोड़ देते हैं।
शादी के शुरुआती दौर में पतिदेव किसी न किसी बहाने रसोई में आते रहते, जब मैं वहाँ काम करती रहती। जब वो रसोई में आते तो मेरी जेठानी वहाँ से किसी बहाने हट जाती।
पतिदेव मेरी कामों में मदद कर देते और इस तरह हम दोनों को साथ में कुछ और प्यार भरे पल गुजारने का मौका मिल जाता। पति का साथ पाकर मेरी थकान मिट जाती और चेहरे पर चमक आ जाती। मैं मन ही मन रोमांटिक सॉन्ग गुनगुना लेती। इस तरह शादी के बाद रसोई से मेरी दोस्ती होने लगी थी। अब रसोई घर उबाऊ नहीं लगता। कभी हमारे प्यार का साक्षी तो कभी मेरी कर्मभूमि सा लगता। मैं भी खाना बनाने में रुचि लेने लगती।
पतिदेव मेरा हौसला बढ़ाते रहते और कभी कभी और अच्छा बनाने की टिप्स भी देते। मैं उनको गौर से देखकर पूछती, " आपने खाना बनाने का ये सब हुनर कैसे सीखा ? " वो कहते, "जब अम्मा बीमार हो जाती तब सब भाई बहन मिलकर खाना बनाते थे। " मैं सोचने लगती कि कभी कभी पतिदेव के हाथ का खाना खाने भी मिलेगा।
होली का त्यौहार आया। हमलोग सुबह से रसोई के कामों में लगे थे। उसके बाद रंगों से खूब होली भी खेले। सबको मालपुआ बहुत पसंद आया था। सबने फरमाइश किया कि थोड़ा सा मालपुआ और बनाया जाए। जेठानी ने घोल तैयार कर दिया। पतिदेव रसोई में आए और उन्होंने अपनी भाभी से कहा, "भाभी, आप बहुत थक गई होगीं। अब आप आराम कीजिए। मालपुआ मैं और नीता मिलकर बनाते हैं।"
उनकी बात सुनकर जेठानी शरारत भरी मुस्कान बिखेरती वहाँ से चली गई।
हम दोनों पति पत्नी मालपुआ बनाने लगे। पतिदेव रसोई में मेरी मदद भी कर रहे थे और प्लेट में मालपुआ रखकर सबको चखने के लिए देने लगे। थोड़ी देर बाद देवर रसोई में आए। उस समय हम दोनों को घुलमिलकर पुआ बनाते देखकर बोले, " सुबह का बना हुआ पुआ अच्छा था और अभी जो पुआ बन रहा है उसको बनाने का प्रॉसेस अच्छा है।"
उनकी बातें सुनकर सब लोग मंद मंद मुस्कुराने लगे। पतिदेव आज भी रसोई में मेरी मदद करते हैं और कुछ नहीं तो कम से कम शाम की चाय बनाकर मुझे जरूर पिलाते हैं। उनके हाथों का बना कुछ स्पेशल डिश इतना अच्छा होता है कि इतने वर्षों बाद भी मैं वैसा नहीं बना पाती। इसलिए खुशामद करके उनसे ही वो स्पेशल डिश बनवाती हूँ।
मेरी जेठानी मुझे चिढ़ाते हुए कहती हैं, "तुम मेरे देवर से खाना बनवाती हो।" उनकी बात सुनकर मैं मुस्कुरा देती हूँ। होली के उन पुराने पलों को याद कर हम जेठानी और देवरानी हँसने लगते हैं। क्योंकि उन्हें भी पता है कि पतिदेव के बनाए डिश में जो मजा है वो खुद के बनाए डिश में कहाँ ?
-सविता शुक्ला
Very nice
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