रिया की शादी को सात साल हुए । वह एक बेटे की माँ भी है। वह एक पढ़ी लिखी औरत है। उसे जौब करना पसंद नहीं है और किसी ने उस पर जौब के लिए दबाव भी नहीं डाला। उसे खाना बनाने का और लोगों को तरह तरह की डिसेज् खिलाने का बहुत शौक है। वह अपने घर को भी बहुत सलीके से सजा कर रखती है। जो भी उसके घर आता है, उसके करीने से सजे घर और उसके बनाए पकवानों की तारीफ किए बिना नहीं रहता है।
उसका पति सुमंत भी उससे बहुत खुश रहता है। पति से अथाह प्यार पाकर रिया हमेशा सुमंत से कहती, "मेरे पति जैसा कोई नहीं।" "क्यों ? ऐसी क्या बात है मुझमें। जो मेरी तरह और कोई नहीं हो सकता है।" सुमंत भी तुरंत उससे पूछता। " वो आपका प्यार है,और कोई इतना प्यार कर ही नहीं सकता। मेरी हर सहेली पति के किसी न किसी आदत से परेशान है। किसी का पति उसकी केयर नहीं करता है तो किसी को पत्नी की आदतें अच्छी नहीं लगती। ऐसे ही खटपट होती रहती है। पर आपने मुझे जीने की आजादी दी है। मेरे कामों से खुश होकर मुझे प्रोत्साहित करते हो। कभी मुझमें मीनमेख नहीं निकालते हो। ऐसा लगता है, हम दोनों का प्यार सिर्फ सात सालों का नहीं जन्मों का है।" रिया खुश होकर कहती।
सुमंत और रिया शादी के सात सालों मे बहुत बदल गए हैं। रिया एक अल्हड़ व नादान लड़की थी और सुमंत एक मस्तमौला लड़का। दोनों को ही दुनियादारी की समझ नहीं थी। सुमंत अपनी जिंदगी की पहली ही इंटरव्यू पास कर बहुत जल्दी जौब मे आ गया था। कम उम्र से ही पैसे कमाने लगा। वह घूमने, फिरने और दोस्तों में ही सारे पैसे खर्च कर देता था। उसे भविष्य की चिंता ही नहीं थी। इसलिए उसका कोई बैंक एकाउंट नहीं था। शादी के बाद कई बार गृहस्थी मे पैसे की समस्या आयी। रिया ने धैर्यपूर्वक हर परिस्थितियों को संभाला और पति को पैसे की कद्र करना भी सीखाया।
सुमंत अपने दोस्तों को बहुत गर्व से सुनाता कि उसकी पत्नी उस पर पूरा विश्वास करती है और हर कदम पर साथ भी देती है। उसके कुछ दोस्तों को ये बातें अच्छी नहीं लगती। क्योंकि उनकी पत्नियां रिया की तरह सुलझी हुई औरत नहीं थीं। उन लोगों ने सुमंत से कहा कि वे लोग रिया की परीक्षा लेंगे। देखते हैं, इस परीक्षा मे रिया पास होती है कि नहीं। सुमंत ने गुस्से मे कहा, " कैसी परीक्षा ? तुमलोग कौन होते हो मेरी पत्नी की परीक्षा लेने वाले।तुमलोग अपनी पत्नियों को संभालो, यही काफी है।मेरी पत्नी को अगर तुम लोगों ने कुछ उल्टा सीधा कहा न, तो मैं तुम लोगों को माफ नहीं करुंगा।" दोस्तों की बातों से रूष्ट होकर वह वहाँ से चल दिया।
एक दिन सुमंत का दोस्त रवि ने रिया को फोन लगाया और बोला,"हेलो, आप सुमंत की पत्नी रिया बोल रही हैं। आपको मालुम है , सुमंत ने एक और शादी की हुई है। अभी उसको एक बेटी हुई है।" रिया ने गुस्से मे पूछा, "आप कौन बोल रहे हो ? " उधर से उत्तर न पाकर उसने फोन करने वाले को डाँटते हुए कहा, "आपको शर्म नहीं आती है, ऐसी ओछी बातें करते हुए। किसी के चरित्र पर लांछन लगाने वाले आप कौन हो ? हिम्मत है तो नाम बताओ।" रिया के सख्त तेवर से डर कर रवि ने बिना कुछ कहे फोन रख दिया। रिया का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। उसे अपने पति पर पूरा विश्वास था। बाबला मन सोचने लगा कि फोन करने वाला कौन होगा ? सुमंत को दूसरी शादी की क्यों जरूरत महसुस हुई ? कभी सोचने लगती कि नहीं, नहीं कुछ भी हो जाए सुमंत ऐसा नहीं कर सकता। जरूर किसी ने उसे परेशान करने के लिए उलजलूल बातें कही हैं।
फोन पर हुई बातों से वह काफी परेशान हो गई। शाम मे पति के घर आने पर उसने सारी बात बतायी, जिसे सुनकर सुमंत को भी बहुत गुस्सा आया। वह सोचने लगा आखिर कौन ऐसा कर सकता है ?
फिर उस को कुछ याद आया। उसने रवि को फोन लगा कर पूछा, "किसने रिया को फोन पर उलजलूल बातें कही है ?"अचानक पूछने पर रवि कोई बहाना नहीं बना सका और बोला, "सौरी यार,मुझसे गलती हो गई।"फोन रखने के बाद उस ने दोस्तों की सारी बातें पत्नी को विस्तार से बतायी। "कहो तो मैं उन लोगों से तुम्हारी बात करवा देता हूँ। मैंने उनलोगों को अगाह भी किया था कि अगर वे लोग तुम्हे कुछ उल्टी बातें कहेंगे तो मै उन्हें नहीं छोड़ूंगा। तुम्हें मुझ पर तो भरोसा है, ना " परेशान पति ने रिया से कहा। तब उस ने कहा,"मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ। आप पर पूरा भरोसा भी है मुझे। पर इस तरह कोई मेरी भावनाओं से खेले यह मुझे मंजूर नहीं।" "अब यह सब दुबारा कभी नहीं होगा। मैं वादा करता हूँ।" सुमंत ने दोस्तों की ओछी हरकतों से शर्मिंदा होकर कहा। "आप शर्मिंदा न हो, अभी ऐसे लोगों को सबक सीखाने की सोचो।"
"दूसरों की खुशहाल जिंदगी से जलने के बजाय वे अपनी जिन्दगी को कैसे खुशहाल बनाया जाय, यह सोचें तो बेहतर होगा। रही बात हमारी तो जहाँ प्यार, विश्वास और समझदारी हो वहाँ गलतफहमियां नहीं टिक सकती। जब हमारी शादी हुई थी, हम दोनों की सोच कितनी अलग थी। हमने एक दूसरे को समझना चाहा और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करने की भी कोशिश की। कई बार हमारी तकरार भी तो हो जाती थी। पर हमने बातों को तूल नहीं दिया इसलिए झगड़ा जल्दी खत्म हो जाता था। धीरे धीरे आपसी समझ बढ़ी। तब गृहस्थी मे सुकून है। ये यों ही नहीं मिलता। बहुत मेहनत करनी पड़ती है।" 'चलो चलते हैं तुम्हारे उन दोस्तों से मिलने, अच्छी तरह डाँट पिलानी है उन्हें। ऐसे दोस्तों को सबक सीखाना कोई टेढ़ी खीर नहीं।" रिया के यह कहने पर सुमंत ने कहा,"श्योर"
दूसरों को परेशान करने से अच्छा है स्वयं को सुधार कर खुश रहने की कोशिश करें।
सविता शुक्ला
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