मीनल आज सुबह से ही पुरानी यादों में खोई थी। हाथ तो कामों को निपटाने में लगे थे। पर उसका मन अतीत की मीठी यादों में विचरण कर रहा था।
वह रोज की तरह पति के ऑफिस जाने के बाद बच्चों की खिदमत में लग गई और उन्हें कॉलेज भेज कर जब घर की तरफ पलटी तो पूरा घर अव्यवस्थित लग रहा था।
सुबह सबको जाने की जल्दी रहती तो तैयार होकर सब भागते। कोई तौलिया बालकोनी में डालना भूल जाता तो कोई किताबों को बिस्तर पर ही बिखरा कर चल देता। डाँटने पर बच्चे कहते, 'मम्मा, आज नहीं, कल हम जरूर करेंगे।' वो कल कभी नहीं आता। बिखरा हुआ घर देखकर वह सोचती कि अब कहाँ से सामानों को समेटना शुरू करूँ ? कभी लगता कमरे के फैले सामानों को समेटूँ, तो कभी लगता कि पहले रसोई को ही सुव्यवस्थित कर लूँ। पर इस असमंजस से निकलने के लिए वह थोड़ी देर शांत होकर बैठ जाती। आज भी वह यही कर रही थी। आँखें मूंद कर वह आरामकुर्सी पर बैठ गई।
उसे शादी के बाद वाले सुहाने दिन याद आने लगते। शादी के कुछ ही महिने हुए थे। पति का प्यार में गजब की खुशबू थी जिससे सुवासित होकर वह खुशियों से चहकती रहती। पति ड्यूटी करने दूसरे शहर चले गए और वह भी कुछ महिने के लिए ससुराल से मायके में रहने आ गई। इस बार मायके में भी पति के प्यार की कमी हमेशा महसूस होती रही। पति भी उसको हमेशा याद करते। उस समय सेलफोन का जमाना नहीं था। चिट्ठियां सबसे महत्वपूर्ण जरिया थी भावनाओं को यहाँ से वहाँ पहुँचाने का।
वह रोज पति की चिट्ठी का इंतजार करती और डाकिया को देखते ही खुश हो जाती। चिट्ठी लेकर वह दौड़कर छत का कोना खोजती और सबसे छुपकर उनकी चिट्ठी पढ़ती। दमकते गुलाबी गालों की चमक को छुपाने की कोशिश भी करती। पति के प्यार का रंग हर समय उस पर चढ़ा रहता। चिट्ठी से ही उसकी खुशियाँ जुड़ गयीं थीं। जिस दिन पति की चिट्ठी नहीं आती तो मुरझाई सी रहती। बहनें उसे चिढ़ा कर कहतीं, "दीदी, जीजाजी की चिट्ठी तो आपकी टॉनिक सी हो गई है। हम तो अब आपके लिए कुछ रहे ही नहीं।" वह बोलती, "नहीं, नहीं। ऐसी बात नहीं है। तुम दोनों ही मेरे लिए टॉनिक हो।"
रोज डाकिया उसके लिए पति की चिट्ठी ले ही आता और जिस दिन चिट्ठी नहीं होती वह दूर से इशारा करता कि आज उसकी चिट्ठी नहीं है। वह मायूस होकर घर के अंदर चली जाती।
कभी कभी पति की पुरानी चिट्ठी बार बार पढ़ती रहती। पति का प्यार एक एक शब्दों से छलकता था जिससे वह अभिभूत रहती। दूसरे के लिए शायद ये पागलपन भी लगता होगा। पर वह लोगों की प्रतिक्रिया पर बिलकुल ध्यान नहीं देती। वह पति के प्यार में पागल थी। ये प्यार सिर्फ शारीरिक आकर्षण युक्त मिलन नहीं, मानसिक मिलन था या यों कहें, दिल से दिल मिल गया था।
जब ससुराल में होती, पति का साथ तो रहता पर मायके की याद हर पल सताती। मायके से आयी चिट्ठी में माँ, पापा का दुलार और भाई बहनों का प्यार घुला रहता था। कभी कभी उनकी चिट्ठी पढ़कर वह भाव विह्वल हो रोने लगती। कभी उनकी चिट्ठी पढ़कर लगता मानो वह मायके में बैठी सारी घटना आँखों से देख रही है। बहनें चिट्ठी में उसे कभी चिढ़ाती तो कभी उसे याद कर रहे माँ पापा की भावनाओं को जताती। कभी दादी की कहानियां लिखतीं, कभी शादी के गीत चिट्ठियों में लिख भेजती। कितने भाव छुपे होते थे चिट्ठियों में। सहेलियों की मजेदार चिट्ठियां वह कैसे भूल सकती है ? उसमें फैशन से लेकर सभी सहेलियों की मस्ती भरी कहानियां भी तो होती थीं। जिसे वह पढ़ पढ़ कर लोटपोट हो जाती।
चिट्ठियों में लिखित हर शब्दों में एक अनूठा संसार बसा होता था। चिट्ठियां मतलब खुशियों की सौगात। कभी कभी चिट्ठियों में बुरी खबर भी होती थीं। अपनों के बिछ़ड़ने का संदेश भी लाती थीं। कभी चिट्ठियों में बड़ों की प्रेरक बातें लिखी होती थीं, जो जिंंदगी की राह को आसान बनाने में सहायक होती थीं। चिठ्ठियों में भावों का खजाना होता था, जिसे खोलते ही हम खो जाते थे उसमें लिखे शब्दों के संसार में।
उसे याद आने लगा कि जब उसे मनलायक अच्छे नम्बर नहीं मिले थे तब वह दुखी होकर दादाजी को चिट्ठी लिखी थी। उसके जबाब में दादाजी ने उसे समझाते हुए लिखा था कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। इसलिए कर्मशील बनो। तुंरत हताश मत हो। तुम मन लगाकर पढ़ो। सिर्फ अपने कर्म पर ध्यान दो। फल की चिंता मत करो। तुम्हारी मेहनत एक न एक दिन रंग लाएगी। तुम अपने लक्ष्य को पाने में अवश्य सफल होगी। दादाजी की ये बातें उसने गांठ बाँध ली और आज भी उस पर अमल करती है। चिट्ठी के द्वारा ही दादाजी ने दूर रहकर भी उसका हौसला बढ़ाया था।
मीनल ने आँखें खोली और पुरानी चिट्ठियों को खोजने अलमारी की ओर बढ़ी। आज वह फिर से पुरानी चिट्ठियों से नाता जोड़ने जा रही थी।
-सविता शुक्ला
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