प्रिय रमा,
मैं आज एक चिट्ठी के माध्यम से तुमसे बात करना चाहती हूँ। मुझे ये जानकर बिलकुल अच्छा नहीं लगा कि तुम काम की अधिकता के कारण हँसना ही भूल गई हो। चिड़चिड़ी हो गई हो। इसके कारण अपने तुमसे दूर हो रहे हैं और तुम्हें भी अकेले रहना अच्छा लगने लगा है। तुम काम करो पर स्वयं पर काम को हावी मत होने दो।
मैं एक राज की बात बताऊँ। तुम बच्चों से दोस्ती कर लो और थोड़ा सा समय उनके साथ गुजारो। सिर्फ तुम्हारा अकेलापन नहीं मिटेगा, तुम्हें जिंंदगी जीने का नया रास्ता भी मिलेगा। तुम एकाग्रचित्त होकर काम करने लगोगी तो कम समय में अधिक काम कर पाओगी और फुर्सत के चंद पल भी निकाल लोगी। अपनों के साथ तुम्हारे रिश्ते फिर से प्रगाढ़ होगें। तुम्हारी जिंंदगी में खुशियाँ लौट आएंगी।
मेरे पड़ोस में दो छोटे छोटे बहुत प्यारे बच्चे रहते हैं। वे जुड़वां है - एक भाई, एक बहन। उनके चेहरे की मुस्कान मेरे चेहरे पर भी मीठी सी मुस्कान ला देती है। दोनों साथ में खूब खेलते हैं और झगड़ते भी हैं। एक दूसरे को थप्पड़ भी जड़ देते हैं। मम्मी पापा से डांट सुनकर चुपचाप बैठ जाते हैं। थोड़ी देर बाद फिर से दोनों साथ में खेलने लगते हैं। मुझे उनका ये प्यार अपनत्व से भरा लगता है।
हम इंसान ही हैं। कभी कभी आपस में मनमुटाव हो जाता है। तब एक दूसरे के लिए अपशब्द भी निकलते हैं। फिर उन बातों को दिल से लगाकर हम बड़े लोग अपनों से नाता तोड़ लेते हैं। बाद में दुखी भी होते हैं और पछतावा भी होता है। पर अहम के कारण झुककर माफी मांगना नहीं चाहते। अगर बच्चों की तरह हम बड़े लोग भी मनमुटाव को भूलकर दोस्ती का हाथ बढ़ा दें तो बहुत से प्यारे रिश्ते फिर से जीवंत हो उठेंगे। हम बड़ों के होठों पर भी बच्चों सी निश्छल मुस्कान फैल जाएगी। जिसे देख दूसरों के चेहरे भी खिल जाएंगे।
मैं ने उन बच्चों को गुरु बना लिया है और जिंंदगी की कठिनाइयों में भी उनके व्यवहार से प्रेरित होकर ही सरल, सहज रह पाती हूँ। अपने खिलौनों को सहेजकर रखना और किसी को एक भी खिलौना नहीं देना। पर मेरे मांगने पर बिना सोचे समझे अपने खिलौने दे देना। ये मुझे सिखाता है कि अपनों के लिए दिल के दरवाजे हमेशा खुली रखना। पर जिन पर भरोसा नहीं है उन्हें अपना सामान कभी नहीं देना। है न ये जिंंदगी की महत्वपूर्ण सीख। ये मैंने बच्चों से सीखा। बच्चे मुझपर भरोसा करते हैं और मैं भी उनके भरोसे को तोड़ती नहीं। उन बच्चों के प्यार में बनावटीपन नहीं है। न तो वे स्वार्थ के लिए मुझसे जुड़े हैं। पर उन्हें मेरे साथ खेलना और बातें करना बहुत पसंद है।
बच्चे कितनी भी पढाई कर लें, खेलने के लिए समय निकाल ही लेते हैं। खेलने से शारीरिक और मानसिक दोनों बल मिलता है। ये तो तुम भलीभांति जानती हो। तो फिर बड़े सिर्फ काम, काम ,काम क्यों करें ? तुम तो जानती ही हो कि समय निकाल कर अपनों के साथ बैठकर बातें करना, कुछ रचनात्मक कार्य करना कितना सुकून देता है। नन्हें बच्चों की तरह हँसना जिंंदगी को सरल और सुंदर बनाती है।
अब तुम्हीं बताओ कि बच्चे हम बड़ों के गुरु हैं न। हम बड़े होकर कर्तव्य की भट्ठी में स्वयं को इतना झोंक देते हैं कि हमारे अंदर का बालमन नष्ट हो जाता है और यहीं से शुरुआत होती है जिंंदगी की कष्टदायक यात्रा। इस यात्रा को सुखदायक बनाने के लिए हमें बच्चों सरीखे सरल जीवन जीना होगा, न छल कपट,न अत्यधिक महत्वाकांक्षा, न भविष्य की चिंता। पर बच्चों को स्वयं के साथ अपने बड़ों पर विश्वास होता है।
आशा है कि तुम मेरी बातों से सहमत होगी और इन पर अमल भी करोगी।
तुम्हारी सहेली
सविता शुक्ला
बेहतरीन
ReplyDeleteबहुत पते की बात लिखी हो सविता..।।
ReplyDeleteसचमुच हमें इन बच्चो से सिख लेनी चाहिऐ।👍😘💖💞