मन में उठती विचारों की लहरों को शब्दों में ढालने की कोशिश है ये, हमारी आपकी बातें हैं और पाठकों के दिलों को छू लेने का प्रयास भी है।

सावन का पावन महीना- जय भोलेनाथ

सावन का पावन महीना- जय भोलेनाथ

 मैं भी आज से एक नया धारावाहिक लेकर आपलोगों के समक्ष आऊंगी. इसमें भगवान भोलेनाथ की कहानियों की भरमार होगी. आपलोगों की कसौटी पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगी.
 
सावन का पावन महीना आज से शुरू हो गया है. यह महीना भगवान शिव को समर्पित है. यह महीना शिव की पूजा अराधना करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है.

गरमी से तपती धरती पर बारिश की बूंदें पड़ती हैं तो चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आती है. ऐसा लगता मानो प्रकृति भी हरे लिबास में सज धजकर भगवान शिव की अराधना करने को आतुर है. चारों ओर खुशियों का माहौल बन जाता है.

मैं आपको अपने बचपन की कुछ यादों से अवगत कराना चाहुंगी. मेरा बचपन देवघर के निकट एक गांव में बीता है. क्योंकि मेरे पापा वहां पोस्टेड थे. 

सावन में पूरे गांव में एक अलग ही माहौल देखने को मिलता था. सुलतानगंज से जल लेकर कांवड़िया पैदल यात्रा कर देवघर यानि वैद्यनाथधाम जाते थे और शिवलिंग पर जल चढ़ाते थे. सभी कांवड़िया नारंगी रंग के कपड़े पहने रहते. कंधे पर जल से भरा कांवड़ लेकर बोल बम बोल बम करते हुए चलते रहते.

हम बच्चे भी उनके पीछे पीछे बोल बम, बोल बम करते दौड़ते तो वे कांवड़िया जोश में आ जाते और जोर जोर से बोल बम बोलने लगते. हम बच्चों को देखकर वे हमें कहते, "बोल बम, बच्चा बम, बोल बम, हर हर महादेव " हम लोग भी जोर जोर से उनलोगों के साथ बोल बम कहकर उनका हौसला बढ़ाते थे.

कांवड़िया हो या आम आदमी सब भगवान भोलेनाथ के भक्ति के रंग में रंगा रहता. भगवान भोलेनाथ की आस्था और विश्वास से जुड़ी बहुत सी कहानियां सुनने को मिलती.

मैं बचपन से ही बहुत जिज्ञासु प्रवृत्ति की रही हूँ. इसलिए बड़े बड़ों से बहुत से प्रश्न पूछती रहती थी और उसके उत्तर पाकर ही संतुष्ट होती थी.

एक बार मैं ने दादाजी से पूछा,"दादाजी, मुझे ये बाताएं कि देवघर में ही भगवान शिव का मंदिर क्यों है ?"

दादाजी ने इससे जुड़ी एक कहानी बताया.  उन्होंने कहा कि देवघर से जुड़ी एक पौराणिक कथा बहुत प्रचलित है. कहते हैं कि रावण भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए जब हिमालय पर तप कर रहा था तब अपना एक एक सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था. जब उसने अपना 10 वां सिर काटने के लिए हाथ उठाया तो भोलेनाथ ने उसे रोक दिया और वरदान मांगने को कहा. तब रावण ने कामना लिंग को लंका ले जाने का वर मांग लिया. भगवान ने उसे वर तो दे दिया, पर ये भी कहा कि इसे जहाँ कहीं भी धरती पर रखोगे ये वहीं रह जाएगा. घमंडी रावण ने सोचा कि मैं कंधे पर इस शिवलिंग को उठाकर ले जाऊंगा और सीधे लंका में ही उस जगह पर रखूंगा जहां इसे स्थापित करना है.

अब सब भगवान चिंतित हो गये. रावण कामना लिंग को लंका में स्थापित कर अपनी हर मनोकामना पूरी करता रहेगा. इससे रावण की शक्ति और बढ़ जाएगी.कामना लिंग से जो मांगों सब मिल जाता है. इसके बाद रावण और अधिक मनमानी करके सबको परेशान करता . देवताओं की मनोकामना भी पूरी हो गई . कामना लिंग को रावण लंका नहीं ले जा सका.

दरअसल हुआ ये कि रावण को चलते चलते लघुशंका महसूस हुई तो वह बेचैन हो उठा. पास से गुजर रहे गरेड़िए को शिवलिंग थमाकर और ये हिदायत देकर कि इसे धरती पर मत रखना वह लघुशंका के लिए चला गया. उसे आने में देर हुई तो गरेड़िए ने शिवलिंग को धरती पर रख दिया और चला गया.

जब रावण वहाँ लौटा तो शिवलिंग धरती में स्थापित हो चुका था. बहुत हिलाने डुलाने पर भी वह शिवलिंग को नहीं हिला पाया  तो गुस्सा होकर वहाँ से चला गया.
वही कामना शिवलिंग देवघर में आज भी स्थापित है. सच्चे दिल से भगवान भोलेनाथ से जो भी मांगो वहां उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है. सावन का महीना भगवान भोलेनाथ को बहुत प्रिय है तो इसलिए सावन में गंगाजल से उनका अभिषेक करके भक्तगण बहुत संतुष्ट होते हैं.

कहानी सुनकर मेरी जिज्ञासा शांत हुई. जय भोलेनाथ.
-सविता शुक्ला


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