प्यार का इजहार मैं रोज करना चाहती हूँ
तुम्हारे हाथ में हाथ डालकर मीलों चलना चाहती हूँ
कभी गुलाब, कभी चॉकलेट कभी टेडीबियर देकर
तुम्हें लुभाना चाहती हूँ
पूरी दुनिया से बेखबर मैं तुम्हें लुभावनी अदाओं से इतराते हुए
आई लव यू कहना चाहती हूँ
पर क्या करूँ ?
तुम्हारे बच्चों की माँ बनकर मैं
चकरघिन्नी बन घूमती रहती हूँ जिम्मेदारियों के इर्दगिर्द
तुम्हारी इच्छाओं, आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए
खटती रहती हूँ गृहस्थी में
रसोई के मसालों की गंध से
सना हुआ मेरा ये वजूद
तपता रहता है
जिम्मेदारियों की आँच पर
फिर भी मेरा दिल
तुम्हें आज भी चाहता है एक षोडसी के प्यार जैसा
उन्मुक्त, अनंत आसमान में विचरते पंछी जैसा
और मैं रोज प्यार का इजहार करना चाहती हूँ
तुम्हारे कंधे पर सर रखकर सुकून के पल बीताना चाहती हूँ।
-सविता शुक्ला
बेहतरीन
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