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दुलारी बिटिया की प्यारी सी जिद

दुलारी बिटिया की प्यारी सी जिद

मीठी घर मे पापा की सबसे दुलारी बिटिया है। पापा ही उसके आदर्श रहे। हर बात वह उनसे बताती थी और उनकी कोई भी बात वह कभी नहीं टालती। उनके साथ बातें करना और अपने ढ़ेर सारे प्रश्नों का जबाब पाकर संतुष्ट होना, यह उसके रोजमर्रा के दिनचर्या मे शामिल था।
 
एक बार वह भी बड़ी दोनों बहनों के साथ मेला घुमने गयी थी। वहाँ दोनों बहनों ने झुमके, चुड़ियां और रंग बिरंगी बिंदियाँ खरीदी। पर मीठी को ये सब बिलकुल पसंद नहीं था। इसलिए वह खूब झूला झूली, चाट और आइसक्रीम खायी और सिर्फ बैलून खरीद कर घर आ गयी। घर आते ही बहने  चुड़ियां, गहने वगैरह सब को दिखाने लगीं। दादी ने पूछा, "मीठी, तुम क्या खरीदी ?" उसने बैलून दिखाते हुए कहा,  "यही"  दादी ने थोड़ा लाड़ दिखाते हुए कहा, "कम से कम रंगबिरंगी चूड़ियां ही खरीद लेती।" उसने मुंह बनाते हुए जबाव दिया,"दादी, मुझे ये सब चीजें अच्छी नहीं लगती।"  

दादी प्यार से उसे समझाते हुए कही,"बिटिया, यही सब लड़कियों को शोभा देते हैं। इसलिए लड़कियों को ये सब पहनने चाहिए।" उनकी ऐसी बातों से वह झल्ला जाती थी और गुस्से मे पैर पटकते हुए जाने लगी तो उसे देख दादी ने  कहा,"ये सब लड़कियों के लक्षण नहीं हैं।"
 
इन बातों से गुस्साई हुई वह पापा के पास जाकर उनसे कही, "पापा, आप मुझे ये बताएं कि लड़कियों को गहने, चूड़ी और बिन्दी वगैरह पहनना क्यों जरूरी हैं।" पापा ने उसके तमतमाए चेहरे को गौर से देखा और उसके गुस्सा को शांत कर खुश करने के लिए कहा, " लड़कियाँ इन्हीं गहनों और साज श्रृंगार मे उलझी रहें और पढ़ाई लिखाई पर ध्यान नहीं दें। मुझे तो ऐसा ही लगता है।" उनकी बातों से आश्वस्त होकर मीठी बोली "आप ठीक कहते हैं। दोनों दीदी मैचिंग बिन्दी और चुड़ियों पर तो बहुत ध्यान देती हैं। पर पढा़ई मे रुचि नहीं लेती हैं। मुझे ये सब पसंद नहीं है। इसलिए मैं अपना ध्यान सिर्फ पढा़ई मे लगाना चाहती हूँ।" 
पापा भी मीठी की इन प्यारी बातों से खुश हो जाते। वह पढ़ने मे ही मन लगाने लगी। कभी कभी दादी उसे टोकती, "मीठी, तू अब बड़ी हो रही है। कम से कम दो दो चूड़ियाँ ही हाथों मे डाल ले।"  वह झट से कहती, "चूड़ियों की खनक से पढ़ाई के समय उसका ध्यान बँट जाता है। इसलिए मुझे नहीं पहनना है।" दादी गुस्से मे बुदबुदाती रहती पर माँ मीठी से बहुत खुश रहने लगी थी।

दोनों बड़ी बहनों का ब्याह हो गया और वे ससुराल मे सुखी जिंदगी जी रही थीं। अब दादी ने मीठी की शादी के लिए भी दबाव बनाना शुरू किया। उसने साफ शब्दों मे कह दिया कि अभी शादी नहीं,  उसे सिर्फ पढ़ना है। उसकी ऐसी बातों से पापा ही नहीं माँ भी बहुत खुश होती थी। उनदोनों ने उसका  हर कदम पर साथ दिया।

मीठी भी खूब मेहनत करती और किताबों मे खोयी रहती। एक दिन उसकी मेहनत रंग लायी। वह नेवी मे अफसर बन गयी। उसे नेवी की वर्दी मे देख दादी की भी आँखें खुशियों से भर आयीं। दादी ने ढ़ेर सारा आशीर्वाद दिया। उसे प्यार करते हुए उन्होंने कहा,"हम तो गहनों और चूड़ियों मे ही उलझ कर रह गये। मीठी ने इनसे अलग रहकर अपना लक्ष्य पा लिया। हम सब को तुम पर गर्व है, मीठी।" आज दादी का भी आशीर्वाद पाकर वह बहुत खुश हो गयी। दादी ने कहा,"मैं तुम्हारे जैसा ही वर तुम्हारे लिए खोज कर लाऊँगी।"  "अभी नहीं दादी, प्लीज " मीठी ने दादी को हाथ जोड़कर विनती की।

पर वह कहाँ मानने वाली थीं। उन्होंने फरमान सुना दिया कि आज ही लड़का की माँ तुम से मिलने आने वाली है। दादी की जिद के आगे मीठी की कुछ न चली तो उसने भी मन ही मन एक फैसला कर लिया।
लड़का की माँ के सामने वह उन्हीं कपड़ों मे गयी जिसमें वह घर मे हमेशा रहती थी और उनके साथ खूब बातें की। यह सब वह इसलिए कर रही थी कि माताजी उसे बहू बनाने से इंकार कर दें। पर मीठी उन्हें बहुत पसंद आयी। मीठी मन मसोसकर रह गयी। फिर आयी बारी लड़के से मिलने की। वह  भी उसकी तरह ही नेवल ऑफिसर था।

मिलते ही मीठी ने उससे कहा,"आप घर मे कह दो कि लड़की मुझे पसंद नहीं। मैं शादी नहीं करना चाहती।" उसने भी पलटकर जबाब दिया,"मुझे तुम पसंद हो तो मैं क्यों कहूँ कि मुझे शादी नहीं करनी। तुम्हें जो कहना है घरवालों से कह दो।"  मीठी की कहीं नहीं चली ये आखिरी वार भी खाली गया। दरअसल शुरू से ही किताबों में खोयी रहने वाली मीठी शादी की जिम्मेदारी से दूर रहना चाहती थी। उसे लगता था कि फिर वह गहनों और कपड़ों मे उलझ कर रह जाएगी। पर अविनाश के रूप मे एक समझदार जीवनसाथी मिला। जिसने उसका सम्मान किया और वह जैसी थी, उसी रूप मे सहर्ष स्वीकार किया।
मीठी एक अच्छी बेटी,पत्नी, बहू और माँ भी है और अपनी हर जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही है। अपनी लगन, मेहनत और अपनों के सहयोग से मीठी ने पा लिया लक्ष्य।
 -सविता शुक्ला

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