जब से कोरोना काल शुरू हुआ है हमलोग घर से बहुत कम ही बाहर निकलते हैं। लॉकडाउन के दौरान खिड़कियों से ही बाहर का नजारा ले लेते थे और टीवी पर न्यूज देखकर कोरोना की स्थिति का आकलन कर लेते थे। उसके बाद दो बार गांव जाने के लिए फ्लाइट की टिकटें करवाई। पर उन्हें कैंसिल करना पड़ा। क्योंकि जब हमारे जाने का समय आया कोरोना एक बार फिर रौद्र रुप धारण कर लिया था।
हमने समय पर वैक्सीनेशन भी करवा लिया था। फिर भी हमने कहीं भी बाहर जाना सही नहीं समझा। कहते भी हैं कि सावधानी बरत कर ही हम इससे सुरक्षित रह सकते हैं।
इस बार सब कुछ ठीक देखकर हमने उज्जैन जाने का प्रोग्राम बनाया और तमाम सावधानियां बरतते हुए हम मुम्बई से उज्जैन जाने के लिए निकल पड़े। अचानक मौसम ने रुख बदल लिया था। मुम्बई में बारिश शुरू हो गई। भींगते हुए ही हमें ट्रेन पकड़नी पड़ी। इसबार हमने ठान लिया था कि बाबा महाकाल का दर्शन करके ही लौटेंगे।
बारिश की वजह से ठंड बढ़ गई। मौसम के मिजाज का अंदाजा लगाकर हमने गरम कपड़ें रख लिए थे।उज्जैन में बहुत ठंड थी। ठंडी हवा भी बहुत तेज चल रही थी। इसलिए हमलोग गरम कपड़े पहनकर ही ट्रेन से उतरे। हमें भस्म आरती का टिकट नहीं मिला था। पता चला कि गर्भगृह में भी कोरोना की वजह से जाने नहीं दिया जा रहा है। फिर भी हमने सोचा कि कम से कम महाकाल के दर्शन तो हो जाएंगे न। बस हमें और क्या चाहिए ? मंदिर के पास ही होटल में सुविधाजनक कमरा मिल गया। नहाकर हमलोग भगवान भैरोनाथ के दर्शन के लिए गए। कहा जाता है कि भैरोनाथ शहर कोतवाल हैं। उनसे आज्ञा लेकर ही हमलोग भगवान महाकाल के दर्शन कर सकते हैं। वहां भी गर्भगृह में जाना मना है। वहां भगवान को शराब का प्रसाद चढ़ाया जाता है। हर बार शराब को एक प्लेट में डालकर उनके मुँह में लगाया जाता था और चंद सेकंड में ही शराब खत्म हो जाता था। पर इस बार शराब को एक घड़ा में डाल दिया गया। क्योंकि अभी गर्भगृह में जाना मना है।
वहां से निकलकर हमलोग माँ काली का दर्शन करने गए। यहां माँ काली को गढ़कालिका कहा जाता है। कहा जाता है कि कालिदास गढ़कालिका के उपासक थे। रोज यहाँ पूजा अर्चना करते थे। सबसे पहले यहीं उनके मुँह से स्त्रोत निकला था।
बारिश और ठंड की वजह से हमलोग ज्यादा नहीं घूम सके। हम मंगलनाथ मंदिर में भी शीश नवा कर लौट आए।
रास्ते में गाड़ी वाले ने एक दूकान के बारे में बताया कि यहाँ हस्तशिल्प के सामान मिलते हैं। सब सामान जेल के कैदियों के द्वारा बनाए गए हैं। मैं उत्सुकतावश वहां गई। क्योंकि हर क्षेत्र के हस्तशिल्प अनूठे होते हैं। कारीगरों के हाथों में वो कमाल होता है जो मशीनों से बनी चीजों में कहाँ ? इसलिए हस्तशिल्प से मुझे बहुत लगाव है।
मुझे वहाँ चंदेरी साड़ी बहुत पसंद आयी और मैं ने उसे खरीद भी लिया। सुंदर कसीदाकारी की हुई सूट के कपड़े देख मैं उसे लेने का लोभ छोड़ नहीं पाई। इस तरह अपनी मनपसंद खरीदारी कर ठंड में भी मेरी खुशी छुपाए नहीं छुप रही थी।
होटल लौटकर हमने खाना मंगवाया और खाकर सो गए। शाम में तैयार होकर बाबा के दरबार में पहुंचे।
महाकाल की शाम की आरती में ऐसा समा बंध जाता है कि हम स्वयं को भूल जाते हैं। वहां हम भगवान में मग्न हो जाते हैं। आरती खत्म होने के बाद भी वहां से जाने का मन नहीं करता है।
मंदिर परिसर में हमलोग सब मंदिरों के दर्शन किए। रक्षासूत्र बंधवाने के बाद मन में ये विश्वास बैठ गया कि अब हमें कुछ नहीं होगा। भगवान है न हमारी रक्षा करने के लिए। और मन में ये विश्वास जगते ही पैरों में अजब सी फुर्ती आ गई।
कोरोनाकाल के कारण पार्क वगैरह में भी जाना बंद था और अस्वस्थता की वजह से मैं घर में भी ज्यादा नहीं चलती। लेकिन महाकाल के दर्शन की अभिलाषा ने मन में उत्साह भर दिया। बारिश और ठंड के बावजूद मैं मंदिरों में दर्शन कर रही थी।
शाम में महाकाल मंदिर की लाइट से पूरा मंदिर परिसर रंगीन रोशनियों से जगमगा रहा था। हम मंत्रमुग्ध होकर देखते रहते। वहां असीम शांति और सुख का अहसास हुआ।
उसके बाद हमलोग बाहर निकलकर खाना खाए और होटल में आकर सो गए। सुबह फिर नहाधोकर मंदिर गए। भगवान महाकाल का दर्शन कर सबके लिए सुख और शांति का आशीर्वाद मांगकर खुश होकर लौटे।
मंदिर के पास पूजा के सामानों की खरीदारी करने में भी बहुत आनंद आया। कहते हैं जब तीर्थ करने जाओ तो सुहाग के सामान जरूर खरीदो। इस लिए मैंने भी चूडिय़ां खरीदी। मैं कहीं जाऊं और चूडिय़ां न खरीदूं ऐसा कभी नहीं हुआ। ये मेरी कमजोरी है। पतिदेव भी मना नहीं करते हैं। उन्हें पता है कि मुझे चूड़ियों का शौक है।
खाना खाकर हमलोग होटल आए और शाम में ट्रेन पकड़कर मुम्बई वापस लौट गए। और हाँ, मैं एक बात बताना तो भूल ही गई कि वहां मैं डमरू खरीदी और मंजीरा भी खरीद कर लाई। रोज पूजा के समय पतिदेव मंजिरा बजाने लगे हैं। बहुत अच्छा लगता है। संगीत में सुकून तो मिलता ही है।
इस तरह तीन साल के बाद हमारी ये छोटी सी यात्रा थी। पर थी बहुत अच्छी। कोरोना के डर से बुझे हुए मन को बहुत शांति और स्फूर्ति मिली।
सविता शुक्ला
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