पतिदेव का ट्रांसफर पोर्टब्लेयर हो गया था और नियत समय पर वो ड्यूटी ज्वाइन करने चले गए। मैं बेटे के साथ बाद में वहाँ गयी। मुम्बई में सारी सुख सुविधाओं की आदत हो गई थी। पर पोर्टब्लेयर में मुम्बई जैसी सुविधा नहीं थी। छोटी छोटी चीजें भी मार्केट में आसानी से नहीं मिलती थीं।
मैं कुछ सहेलियों के सहयोग से जरूरी चीजों की शॉपिंग कर लेती थी। व्यस्त पतिदेव ये देखकर खुश थे कि उनकी पत्नी आत्मनिर्भर बन गई है। क्योंकि मैं दिनभर उनका इंतजार करती और शाम में वो मार्केट से सामान लाने के लिए तैयार नहीं होते। कहते कि बहुत थक गया हूँ आज नहीं कल। पर अगर कह दो कि कहीं घूमने चलिए तो तुरंत तैयार हो जाते। घूमने और घूमाने में उन्हें बहुत आनंद आता है।
अंडमान, निकोबार द्वीपसमूह जो एक केन्द्र शासित राज्य है, उसकी राजधानी पोर्टब्लेयर है। यहां चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली से फ्लाइट द्वारा जा सकते हैं। समुद्री जहाज से भी चेन्नई और कोलकाता से यहां पहुंचा जा सकता है।
नीले समुद्र से घिरा हराभरा पोर्टब्लेयर बहुत सुंदर जगह है। यहां का वातावरण बिलकुल प्रदूषण रहित है। यहां रहने और घूमने का अलग ही मजा है।
इसलिए पतिदेव के घूमने जाने के ऑफर को मैं कभी नहीं ठुकराती। जब भी वो बोले चलो घूमने चलते हैं तो मैं भी बेटे सहित तैयार रहती। एक शाम हमलोग सेल्युलर जेल गए। यह जेल ऑक्टोपस के आकार में बनाया गया था। जिसमें सात भाग थे। अभी इसका सिर्फ तीन भाग ही बचा है।
जेल में एक छोटा सा म्युजियम है जिसमें विभिन्न मुर्तियों के द्वारा ये बताया गया है कि उस जमाने में अंग्रेज भारतीयों से कैसे कैसे कठिन काम करवाते थे और हाँ उन्हें लोहे के मोटे जंजीर में जकड़ कर भी रखते थे। ये देखकर ही दिल दहल जाता है।
जेल परिसर में एक फांसीघर भी है। जहाँ कैदियों को फाँसी दी जाती थी। एक पीपल का पेड़ है। जब शाम में लेजर लाइट के द्वारा जेल की निर्मम दास्तान सुनाई जाती है तब यही पीपल का पेड़ उन मासूम कैदियों के दर्द का गवाह बनकर हमें उनकी दुख दर्द से भरी कहानियां सुनाता है। जिसे सुनकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो क्रूर अंग्रेज अफसर भारतीय कैदियों पर बेरहमी से कोड़े बरसा रहा है और मासूमों की चीख से हम मनुष्य क्या धरती माँ का सीना भी चित्कार उठा है।
एक एक कोठरी से गुजरते हुए मेरा मन दुख से इतना भारी हो गया था कि लगता था पैर आगे नहीं बढ़ रहे। शरीर शुन्य होता जा रहा है। वीर सावरकर की कोठरी के सामने इतिहास की बहुत सी कहानियां एक साथ मानस पटल पर आने जाने लगीं।
वहां घूमते हुए क्रूर अंग्रेजों के प्रति नफरत की भावना मन में आती है तो भारतीय कैदियों स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारा सिर नतमस्तक हो जाता है। दिलों में देशभक्ति का जज्बा हिलोरें लेने लगता है। देश पर मर मिटने को आतुर होने लगता है। देश को आजादी दिलाने के लिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितने कष्ट सहे। तब हम आजाद भारत में सांस ले पा रहे हैं। उन लोगों को नमन कर हम लोग घर लौट आए।
घर आकर भी वहाँ की भयावहता दिल को झकझोरती रही। जिन्होंने उसे झेला होगा। उन पर क्या बीतती होगी। सोच सोचकर दिल दहल उठता।
हमारी नयी पीढ़ी को वहां जरूर जाना चाहिए और स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को याद करना चाहिए।
आगे की कहानी बाद में.........
सविता शुक्ला
बहुत सुंदर
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