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सहनशीलता कमजोरी नहीं है

सहनशीलता कमजोरी नहीं है

आज सहनशीलता शब्द मेरे दिमाग में खलबली मचा रही है। हमारे जमाने में लड़कियों को सहनशील होने का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता था। सहनशील रहने से दूसरे को माफ कर देने की क्षमता विकसित होती है। इसकारण परिवार में मतभेद या मनभेद जो भी होता था, जल्द समाप्त हो जाता था। परिवार में सुख शांति, भाईचारा, सौहार्द कायम रहता था।
सहनशीलता से जब परिवार की बगिया में खुशियों के फूल चारों ओर खिले रहें तो सहनशील होने में कोई बुराई नहीं है। पर धीरे धीरे मानसिकता बदलने लगी। सहनशील व्यक्ति को कमजोर समझा जाने लगा। उस पर अत्याचार चाहे मानसिक ही क्यों न हो, किया जाने लगा। लोगों ने सहनशील होने के कारण बहुत दुख झेला। सामने वाला उसकी सहनशील प्रवृत्ति का लाभ उठाकर शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रुप में शोषण करने लगा। अंततः विरोध शुरू हुआ। सहनशीलता की परिकाष्ठा पार करते ही विद्रोह की चिंगारी फैलने लगी। समाज बदलने लगा। लड़कियों, औरतों की मानसिकता भी बदली।
अब माएँ अपनी बेटियों को सहनशील होना सिखाती हैं, पर पानी जब सिर के उपर से गुजरने लगे तो आवाज उठाने की हिम्मत भी उनमें भरती हैं।
सहनशील होना बहुत अच्छा गुण है। कई मौकों पर सहनशील रहकर बड़ी से बड़ी समस्या को सुलझा लिया जाता है। हर समस्या को लड़ झगड़कर ही खत्म नहीं किया जा सकता। 
मुझे एक वाकया याद आ रहा है। दो जिगरी दोस्त थे। दोनों में आपस में बहुत पटती थी। दोनों दोस्त एक दूसरे के सुख और दुख में शामिल होते। एक दोस्त कमाने के लिए दूर देश चला गया। दूर रहकर भी उनकी दोस्ती कम नहीं हुई। दोनों फोन से एक दूसरे का हालचाल पूछते रहते। किसी ने गांव में रहने वाले दोस्त के मन में दूसरे दोस्त के प्रति कुछ गलतफहमियां डाल दीं। उसके बाद वह अपने दोस्त को फोन करना बंद कर दिया। उसका फोन भी आता तो वह अनमने ढ़ंग से बात करता। दूर रह रहे दोस्त को समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्यों उसका जिगरी दोस्त का व्यवहार बदल गया है ? तनिक सोच विचार कर उसने फैसला लिया कि कुछ समय के लिए वह अपने दोस्त को फोन नहीं करेगा। अपने कामों में वह लगा रहता। उसके कामों में खूब तरक्की हो रही थी। सुख सुविधाओं की कमी नहीं थी। परिवार में भी सुख शांति थी। पर उसका मन दोस्त की आवाज सुनने के लिए लालायित रहता था। वह सहनशील प्रवृत्ति का था। इसलिए धैर्य बनाए रखा। वह चाहता तो दोस्त पर खूब गुस्सा होता और उसे अपशब्द कहता। पर उसने ऐसा नहीं किया। क्योंकि उसे पता था कि गलतफहमी की दीवार खोखली होता है। कुछ दिनों  बाद विश्वास की हल्की सी धौंस पड़ते ही गिर जाती है। उसे अपनी दोस्ती पर विश्वास था।
गांव वाले दोस्त को बिजनेस में बहुत आर्थिक नुकसान हुआ। उसने सबसे मदद मांगी। किसी ने उसकी मदद नहीं की। उसे पुराने दोस्त की याद आई। फोन किया तो दोनों तरफ से आंसुओं की धारा बहने लगी। जब मन शांत हुआ। तब उसने हिचकिचाते हुए दूर रह रहे दोस्त को अपना दुख दर्द सुनाया। उसके दोस्त जिसे उसने गलतफहमी के कारण छोड़ दिया था, उसने हरसंभव मदद करने का आश्वासन दिया। तब उसे बहुत सुकून मिला। बाद में दोस्त की मदद से वह फिर से आर्थिक स्थिति को ठीक कर पाया। अब दोनों दोस्तों के ठहाके गूंजते हैं तो यह सहनशीलता की ही जीत है। दोस्ती की नींव विश्वास पर टिकी रहती है तो इसके परिप्रेक्ष्य में सहनशीलता भी है।
सहनशीलता में विश्वास भी निहित होता है, जो कठिन से कठिन परिस्थिति को भी हराने का जज्बा रखता है।
इसलिए मुझे ऐसा लगता है कि सहनशीलता कायरता की निशानी नहीं है। यह तो बहुत सारे गुणों को समेटे एक मजबूत हथियार है जिससे पहाड़ को तोड़कर रास्ता बनाया जा सकता है।
सविता शुक्ला

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