मैं पूरे साल बहुत मन लगाकर पढ़ती थी। किताबों से गहरी दोस्ती रही मेरी। पढ़ना - लिखना बहुत पसंद था मुझे। पर एक समस्या थी । फाइनल एक्जाम के पहले बहुत घबड़ा जाती थी और एक दिन रो भी लेती कि पता नहीं क्या होगा ? मैं अच्छी तरह से पास करूँगी कि नहीं ? कहीं परीक्षा में पूछे गए प्रश्न सिलेबस के बाहर से तो नहीं आ जाएंगे ?
अंदर ही अंदर ये भी जानती थी कि अगर ऐसा हुआ तब भी कुछ न कुछ तो लिखकर ही आऊँगी। "सर जी, पास कर देना। मैं जो पढ़ी थी, उसमें से प्रश्न नहीं पूछे गए हैं। इसलिए मुझे इसके उत्तर नहीं आते। प्लीज, मुझे पास कर दीजिए।" ऐसी बातें लिखकर आने वालों में से मैं नहीं थी।
फिर भी एक्जाम से पहले एक दिन रोना जरूरी था। पहले घर में सबलोग घबड़ा जाते थे कि इसको क्या हो गया ? ये क्यों रो रही है ? बाद में सबको पता चल गया था कि ये एक्जाम से पहले वाली घबड़ाहट है। तब सबलोग मुझे समझाते कि जब तुम अच्छी तरह से पढ़ाई की हो तब क्यों घबड़ाती हो। मैं उनकी बात सुनकर शांत हो जाती।
लेकिन अगली बार फिर वही बात। ये बात मैं ने अपने पति को बताई। वो भी मेरी आदत से वाकिफ हो गए हैं। उन्हें पता है कि रोएगी और बाद में सबकुछ अच्छे से करेगी।
जैसा पहले होता था कि हर परीक्षा का रिजल्ट अच्छा ही आया। आज भी वही होता है। घबड़ाती हूँ, पर हर परीक्षा में अच्छी तरह से पास हो जाती हूँ।
मनुष्य की कुछ आदतें नहीं बदलती हैं। समय बदला, परिवेश बदला। उम्र के साथ साथ अनुभवों ने बहुत कुछ सिखाया। सोच में भी परिपक्वता आई। पर कुछ आदतें नहीं बदलीं।
हम अपनी कमजोरियों को जानते हैं, पहचानते हैं। फिर भी नहीं बदलते तो इसका मतलब है कि हम उन आदतों को जानबूझकर छोड़ना नहीं चाहते।
सच, कुछ आदतों को मैं छोड़ना नहीं चाहती। क्योंकि ये आदतें मुझे मेरे अतीत से जोड़े रखती हैं। कहीं न कहीं मेरे होठों पर मुस्कुराहट ला देती हैं। हाँ सच है ये। मैं सोचती हूँ, "कितनी बुद्धू थी मैं !" जबकि सच्चाई यही है कि मैं आज भी नहीं सुधर पाई।
- सविता शुक्ला
No comments:
Post a Comment