एक अल्हड़ लड़की माँ बनते ही
भूल जाती है अल्हड़ता
जीने लगती है वह बच्चे के लिए
अपनी नींद, अपना आराम
सब न्योछावर कर देती है वह
बच्चे के लिए
पर कर्तव्य नहीं भूलती,
ममत्व के आगे स्वयं को भूल जाती है
वह एक आम स्त्री है, यह भी भूल जाती है
देवी बन लुटाती है अपनी ममता
सर्वस्व बन जाती है बच्चों के लिए
वह जीने लगती है सिर्फ बच्चे की खुशियों के लिए
उसकी एक किलकारी पर आत्मविभोर हो जाती है
हाँ, स्त्री माँ बनते ही देवी बन जाती है।
सविता शुक्ला
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