ये उन दिनों की बात है, जब हम बहुत छोटे थे. मेरे पापा का ट्रांसफर एक छोटे से गांव में हो गया था.
वहां से देवघर काफी नजदीक था. रहने के घर की अच्छी सुविधा न होने के कारण पापा ने थोड़ी सी जमीन खरीदी और एक प्यारा सा घर बनाया. क्योंकि वहां बहुत सालों तक रहना था.
वहां का वातावरण भी शांत और शुद्ध था. वहां रहने के लिए हमलोग बहुत उत्साहित थे. नया घर, नया माहौल हम सबको बहुत अच्छा लग रहा था. मेन रोड पर घर था. हमलोग हाथ दिखाकर बस रुकवा लेते थे और उसमें सवार होकर गंतव्य तक पहुंच जाते थे. बहुत अच्छा लगता था जब छोटे से बच्चे के हाथ दिखाने पर बस रूक जाती थी. दरअसल वहाँ मेरे पापा को ज्यादातर लोग पहचानते थे. इसलिए पापा के साथ रहने पर मैं बस रुकवाती थी और खुश हो जाती थी. मेरी खुशी देख पापा भी बहुत खुश होते और कभी मुझे ऐसा करने से नहीं रोकते.
हमारे पड़ोस में डॉक्टर साहब रहते थे. उनको हमलोग चाचा जी कहते थे. उनकी बेटियाँ हमारी सहेलियाँ थीं और हमारी माँएं भी पक्की सहेलियाँ बन गई थी. दोनों घरों में ऐसा मेलजोल हो गया था कि दोनों घरों के लोग एक दूसरे की सुख दुख में साथ रहते.
हम सहेलियाँ लड़ भी लेतीं . फिर एक दूसरे के बिना रह नहीं सकतीं. इसलिए तुरंत दोस्ती भी हो जाती.
होली, दीपावली, दशहरा हो या जन्माष्टमी हम सब लोग साथ में मनाते थे. सरस्वती पूजा में घूमने निकलते तब भी दोनों परिवारों की महिलाएं और बच्चे साथ रहते. रोज हमलोग मिलते. कभी मेरी माँ उनके घर जाती तो कभी चाची मेरे घर आतीं.हम सबको एक दूसरे की आदत हो गई थी. सुबह टहलने भी निकलते तो सब लोग टहलते और साथ में खूब गप्पें भी मारते.
फिर वे लोग भी दूसरी जगह शिफ्ट हो गये और मेरे पापा भी ट्रांसफर के कारण उस घर को बेचकर दूसरी जगह घर बना लिए. दोनों परिवारों में बहुत से उतार चढ़ाव आए.सबकी जिंदगी भी बदल गई. समय के साथ बहुत कुछ बदल गया. पर बचपन की उन खट्टी-मीठी यादों की पोटली आज भी अभिभूत कर जाती है.
एक बार मेरा पैर कट गया था और मैं जोर जोर से रोने लगी. मम्मी पापा भी बहुत घबड़ा गए. पापा ने कहा, "डॉक्टर साहब के पास ले चलते हैं.स्टिच कर देंगे तो जल्दी ठीक हो जाएगा." डॉक्टर चाचा के इंजेक्शन से मुझे बहुत डर लगता था और यहाँ तो स्टिच लगाने की बात हो रही थी. मैं रोते रोते बोली, "नहीं मैं डॉक्टर चाचा के पास नहीं जाऊंगी. नहीं मैं डॉक्टर चाचा के पास नहीं जाऊंगी." मैं ने इतना हो हल्ला मचाया कि अंत में पापा ने कहा, "ठीक है, हम तुम्हें वहाँ नहीं ले जाएंगे." फिर मेरे घाव की अच्छी तरह मरहम पट्टी की गई और होम्योपैथिक इलाज करवाया गया. पूरी तरह से ठीक होने में काफी समय लगा. एक दिन पिंकी दीदी (डॉक्टर चाचा की बड़ी लड़की ) ने मुझसे कहा, "पापा के पास जाती. दो तीन स्टिच लगाते तो तुम्हारा घाव जल्दी रिकवर हो जाता. " मैं कुछ कहती इससे पहले ही माँ ने कहा, "इसी डर से तो ये नहीं गई कि डॉक्टर साहब स्टिच लगा देगें." आज भी मेरी ऐसी हरकतों को यादकर सब खूब हँसते हैं.
समय बदलता रहा.हम सब बदल गये. जिम्मेदारियों ने हमें परिपक्व बना दिया. पर बचपन के उन दिनों के खुशनुमा पलों को यादकर आज भी होठों पर बरबस मुस्कुराहट आ ही जाती है . प्यार और अपनापन से सींचे हुए बचपन में ही तो संस्कार की मजबूत नींव पड़ती है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुंदर बनाती है.
सविता शुक्ला
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