मन में उठती विचारों की लहरों को शब्दों में ढालने की कोशिश है ये, हमारी आपकी बातें हैं और पाठकों के दिलों को छू लेने का प्रयास भी है।

दिलों को जोड़ती है हिन्दी

दिलों को जोड़ती है हिन्दी


हिन्दी हमारी जान है। हिन्दी हमारी शान है। हिन्दी हमारा अभिमान है। हमने हिन्दी में ही बोलना सीखा है। हमने बचपन से ही आसपास सब लोगों को  हिन्दी में ही बोलते देखा है। यह हमारे रग रग में समायी है।

हिन्दी हमारी धरोहर है, जो पुरखों से हमें मिलती आयी है।  इसमें आदर्श जिंदगी जीने की कला सिखाने वाली समृद्ध साहित्य है। हिन्दी साहित्य ऐसा सागर है, इसमें जितना गोते लगाओ उतना ही बड़ा ज्ञान का भंडार मिलेगा। तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी शब्दों से सुसज्जित हिन्दी की छटा निराली है।

इसलिए मैं ने बच्चों को भी हिन्दी से प्रेम करना सिखाया। हिन्दी में अपनेपन की मिठास है। क्योंकि हम हिन्दी सिर्फ बोलते ही नहीं हैं, हिन्दी में सोचते हैं। हिन्दी में गुनगुनाते हैं। हिन्दी में मनोभावों को गढ़ते हैं और हिन्दी में ही रिश्तों की मधुरता को कायम रखने के लिए चिट्ठी से लेकर व्हाट्सएप तक संवाद करते आए हैं। जो बात माँ कहने में है वह मम्मी में नहीं। माँ शब्द में व्याप्त मिठास रिश्तों में अपनत्व भर देता है।
ये अपनत्व हिन्दी के शब्दों की सुंदरता है।

करीब बीस साल पहले की बात है। पतिदेव का स्थानांतरण मदुरै हो गया था। हम हिन्दीभाषी तमिलनाडु में रह रहे थे। वहाँ तमिल और अंग्रेजी भाषा बोली जाती थी। दूध या सब्जी वालों की तमिल हमें समझ में नहीं आती थी और हमारी हिन्दी उन लोगों को समझ में नहीं आती थी। हमें इशारों में बात करके किसी तरह काम चलाना पड़ता था। हमारी जान पहचान वहाँ रह रहे कुछ परिवारों से हो गई। पहले हमलोग इशारे में मुश्किल से अपनी बात उन्हें समझा पाते और उनकी बातें भी समझने में हमें कठिनाई होती। उनके बच्चों से भी हमारी दोस्ती हो गई। वे बच्चे स्कूल में थोड़ी हिन्दी पढ़ते थे। इसलिए वे अपनी माँ की बात हिन्दी में मुझे समझाते और मेरी बात अपनी माँ को समझाते। उन लोगों को हिन्दी इतनी अच्छी लगी कि वे हिन्दी मूवी देखने जाने लगे और मूवी देखकर आते तो बहुत खुश होकर हमें उस मूवी के बारे में बताते। इस तरह धीरे धीरे हिन्दी से उनका जुड़ाव होने लगा।
 
एक बार मेरे बेटे को खेलते हुए पैर में चोट लग गया। हम लोग उसे डॉक्टर के पास ले गये। हम जिस डॉक्टर से बेटे का इलाज कराने गए थे, वहाँ वह डॉक्टर नहीं थी। एक दिन के लिए वह छुट्टी पर थी। उसकी जगह दूसरी डॉक्टर बैठी थी। मैं ने बेटे से कहा," डॉक्टर को अपनी चोट दिखाओ।" मेरे मुँह से निकली हिन्दी सुनकर डॉक्टर ने चौंक कर पूछा,"आप लोग हिन्दी बोलते हो। मैं बहुत दिनों बाद हिन्दी सुनी हूँ। बहुत अच्छा लगा।" मैं ने कहा, "हाँ, हम हिन्दी भाषी हैं। पति के स्थानांतरण के कारण हम लोग अभी यहाँ रह रहे हैं।" वह बहुत आत्मीयता से हमसे बातें करने लगी। ऐसा लगा हमारी बरसों की पहचान हो। क्लीनिक उस दिन खाली ही था तो उसे हम से बात करने का भी मौका मिल गया।

वह खुलकर हम लोगों के साथ हिन्दी में बात कर रही थी। इससे पहले हमलोग कभी नहीं मिले थे। पर हिन्दी ने हमें जोड़ दिया। वह अपने बहुत सारे अनुभव हमें बता रही थी और हमारी बातें भी गौर से सुन रही थी। हमलोगों को भी बहुत अच्छा लगा। उसकी कही बहुत सारी बातें अभी भी हमारे काम आती हैं।

 एक बार हमलोग मदुरै के ही बाजार में घूम रहे थे। एक आटा चक्की के पास से गुजरते हुए हमलोग अचानक रुक गए। क्योंकि वहाँ से बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। हमलोग उस सुगंध से अभिभूत होकर उस चक्की के पास पहुँच गये और पूछने लगे कि ये किस मसाले की खुशबू है ? चक्की वाला भी हम से टूटी फूटी हिन्दी में बातें करने लगा। उसने बताया कि उसने स्कूल की किताबों में हिन्दी पढ़ा है। इसलिए थोड़ी सी हिन्दी उसे भी आती है। हम लोगों से बात करके वह बहुत खुश हुआ। हिन्दी में उसने बताया कि वह खुशबू रसम के मसालों की थी। चक्की में विभिन्न मसालों को पीस कर रसम पाउडर तैयार किया जा रहा था। उसने अपने घर से रसम मँगाकर हमें पीने के लिए दिया। हम गरमागरम रसम का मजा हिन्दी में बातें करते हुए ले रहे थे। इसतरह हमलोग हिन्दी वाले के रूप में वहाँ लोकप्रिय हो गये थे। हम से बातचीत करने के लिए लोग हिन्दी में बात करने की कोशिश करते तो मन गद गद हो जाता।
ये है हिन्दी की सुंदरता। ये दिलों को जोड़ती है।
 - सविता शुक्ला

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