मन में उठती विचारों की लहरों को शब्दों में ढालने की कोशिश है ये, हमारी आपकी बातें हैं और पाठकों के दिलों को छू लेने का प्रयास भी है।

हरिया का सपना

हरिया का सपना

बारिश अच्छी हुई । हरिया एक छोटा किसान है। वह धान की रोपाई में लग गया। वह धान रोप रहा था और हरे भरे फसल की उम्मीद कर रहा था। वह सोचने लगा, "कितना भी मेहनत कर लूँ, पाँच लोगों के परिवार का भरण पोषण ठीक से नहीं कर पाता हूँ। किसी तरह खाना तो जुटा लेता हूँ। पर बच्चों को पढ़ा लिखा नहीं पाता। मैं गरीबी के कारण अनपढ़ ही रह गया। इसका मलाल अभी तक है। बेटा दौलत को अवश्य पढ़ाऊँगा। पर कैसे ? " उसके मन में अक्सर ऐसी बातें चलती रहतीं। पर उपाय नहीं सूझता।


वह धान रोप कर घर पहुँचा तो पत्नी मालती खाना बनाकर उसका इंतजार कर रही थी। वह नहाधोकर खाने बैठा। तब मन की बात मालती से बताया।  पत्नी ने कहा,"मेरी बात मानो तो एक सलाह दूँ। मेरे भाई का बेटा लीलाधर एक मास्टर साहब के पास पढ़ता है। वह गरीब बच्चों से फीस नहीं लेते हैं। लीला उनके पास दो सालों से पढ़ रहा है। आप भी जाकर उनसे मिलो।" हरिया ने पत्नी की बात मान ली। 

 
उसे मास्टर साहब के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह गरीब किसान था, पर था वह मेहनती और स्वाभिमानी। वह अपनी गरीबी और लाचारी किसी को दिखाना नहीं चाहता था। पर बेटा के भविष्य की भी चिंता थी।
 
उसने पहले लीलाधर से मिलने के बारे में सोचा। लीलाधर ने उसे विश्वास दिलाया कि उसके मास्टर साहब उसकी तरह ही दौलत को भी अवश्य ही पढ़ाएंगे। लीला से बात करके उसे सुकून मिला तो वह हिम्मत करके मास्टर साहब के पास पहुँचा। पर उन्हें प्रणाम करने के बाद वह संकोचवश कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। लीलाधर ने सारी बात मास्टर साहब को बतायी।
 
 मास्टर साहब ने कहा, "हरिया, तुम्हारा बच्चा मेरे पास पढ़ेगा। मैं उसे शिक्षित करूँगा ।" हरिया खुश होते हुए बोला, "साहब, मैं पैसा तो नहीं दे पाऊँगा। पर मैं आपके घर में काम करूँगा। आपके खेत जोत दूँगा। आप जो कहेंगे मैं सब करूँगा।" मास्टर साहब बोले, " हरिया, तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं है। तुम सिर्फ बच्चे को रोज पढ़ने भेज देना। जैसे इतने सारे बच्चे पढ़ रहे हैं, वैसे ही वह भी पढ़ लेगा।" हरिया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। 

मास्टर साहब की छत्रछाया में दौलत मन लगाकर पढ़ने लगा। हरिया सुंदर भविष्य के सपने देखते हुए पूरी तन्मयता से खेत में काम करता रहा। बेटा मैट्रिक पास कर शहर के कौलेज में पढ़ने चला गया। मास्टर साहब उसका मार्गदर्शन करते रहे और छुट्टियों में घर आकर वह पिता का हाथ भी बँटाता। समय निकाल कर मास्टर साहब से पढ़ने भी चला जाता।

बी डी ओ साहब से मिलकर सरकारी योजनाओं की जानकारी लेता और अपने बापू को समझाता। इस तरह हरिया को खेती में बहुत फायदा होने लगा। दौलत अपनी बहनों को भी पढ़ाता था। एक दिन उसने कहा,"बापू, आप और माई भी थोड़ा पढ़ लो। मैं आप लोगों को भी पढ़ाऊँगा।" बेटा की बात सुनकर मालती और हरिया हँसने लगे। पर वह भी उन्हें छोड़ने वाला नहीं था। माता पिता को हिन्दी में नाम लिखना सीखा दिया। दौलत पढ़ाई पूरी कर गाँव मे ही रहने लगा और बैंक से कर्ज लेकर एक ट्रैक्टर खरीदा। वह पिता से सलाह लेकर खेती करने लगा। पुरानी पीढ़ी को नयी पीढ़ी का साथ मिलता है तो प्रगति का रास्ता प्रशस्त हो जाता है।

हरिया के घर खुशहाली आ गई।

धान रोपते हुए हरिया सोच रहा था कि  स्वस्थ पौधा को उर्वरक जमीन और बारिश का साथ मिल जाता है तो धान की फसल को लहलहाने से कोई नहीं रोक सकता जैसे उसकी सोच को मास्टर साहब का सहारा मिला तो बेटा पढ़ लिख गया। 

सच, धान का एक एक पौधा रोपते हुए किसान अपने सपनों को बोता है और रात दिन मेहनत करता है। इस तरह लहलहाते फसलों का सपना साकार होता है।

-सविता शुक्ला

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